सुभाष युवा मोर्चा - अपनों में बेगाने देश के असली योद्धा

ज्ञात-अज्ञात लाखों लोगों ने जीवन आहूत किये, तब जाकर 15 अगस्त 1947 को भारत आजाद हो पाया. बुनियाद की ईटों की तरह ज्यादातर की शहादतें जमीन में ही दफन हो गयी. जब क्रांतिकारियों की बात चलती है, तो दस, पंद्रह लोग, जिनमें भगतसिंह, चन्द्रशेखर आजाद, रामप्रसाद बिस्मिल आदि आते हैं. बस यह आम आदमी की सूची पहुँच पाती है और इन दस, पन्द्रह लोगों से शायद ही दो या तीन ही होते होंगे, जिनके संघर्षों को आम आदमी तक पहुँचाने का काम पिछले 70 वर्षों में सत्ता, शासन द्वारा किया गया है.

विडंबना है वो लोग उनके संघर्ष, त्याग अंग्रेजी शासन में गुमनाम रहे ही आज भी आम जनता तक नहीं पहुँच पा रहे है वर्तमान में जो भी राजनीतिक दल और संस्थाऐं भारत में मौजूद है वो अपने कुछ खास लोगों प्रतीको को ही आजादी, देशभक्ति का सारा श्रेय देना चाहते हैं. पूरे देश में कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी दो राजनीतिक दल हैं जो पूरे देश में कहीं ज्यादा कहीं कम अपनी उपस्थित रखते हैं. इनके बाद साम्यवादी दल जो कुछ प्रदेशों तक सीमित है. बाकी क्षेत्रीय पार्टी के एक या दो राज्य से बाहर आने में ही हाँफने लगती है.

कांग्रेस पार्टी आजादी का सारा श्रेय महात्मा गाँधी, जवाहरलाल नेहरु, सरदार पटेल को ही देना चाहती है. यहाँ तक की लम्बे समय तक कांग्रेस के बैनर तले ही आजादी की लड़ाई लड़ने वाले नेताजी सुभाष चन्द्रबोस भी उपेक्षित देश के सबसे बड़े और सबसे ज्यादा समय तक सत्ता में रहने वाले दल में रहें है. बाकी लोगों के संघर्ष को आम-जनता तक पहुँचाने का काम कांग्रेस करने में इच्छुक नहीं है. इसका एकमात्र कारण इस दल पर एक ही परिवार (गांधी-नेहरु) का स्पष्ट कब्जा है.

इसके बाद देश का दूसरा राजनीतिक दल बीजेपी आता है जो एक बड़े संगठन आरएसएस का राजनीतिक हाथ है. इस संगठन का कोई भी व्यक्ति इसके संस्थापक डा. हेडगेवार को छोड़कर आजादी की लड़ाई में नहीं लड़ा है. इस संगठन ने आजादी की लड़ाई को, स्वतंत्रता का संघर्ष तक नहीं माना है. पिछले करीब 40 वर्षों में भारतीय जनता पार्टी व संघ की (सरकार जनता पार्टी 1977 में बनने से) ताकत पूरे देश में सबसे ज्यादा तेजी से बढ़ी है. ये भारत का सबसे अनुशासित व बड़ा संगठन है पर इस संस्था ने स्वतंत्रता सेनानियों के संघर्षों को जनता तक लाने की कोई कोशिश नहीं की है.

ये डा. हेडगेवार गोलवरकर, दीनदयाल उपाध्याय आदि अपने कुछ प्रतीकों के अतिरिक्त किसी अन्य देशभक्त के गुणगान करवाने की कोई सोच नहीं रखते है. हाँ अगर किसी प्रतीक को आगे रखने से नेहरु, गाँधी को नीचा दिखाया जा सकता है तो सबसे पहले नहीं तो उसका नाम तक भी लेना भी इनकी सोच में शामिल नहीं है.


साम्यवादी दल जो अब कई इस देश में है, मार्क्स लेनिन माओ आदि विदेशी विचार में राजनेताओं व अपने कुछ भारतीय नेताओं को छोड़कर किसी का भी नाम नहीं लेते है. शहीद भगतसिंह का जरुर ये लोग बड़ी ताकत के साथ प्रचार-प्रसार करते हैं क्योंकि अपने जीवन के अन्तिम दिनों में वो साम्यवादी विचारधारा के बड़े समर्थक थे.

द्रविड पार्टियाँ पेरियार, अन्ना, एमजीआर करुणानिधि से आगे बढ़ने के लिये 70 साल में भी तैयार नहीं है. दलित आंदोलन की कोख से निकली पार्टी बहुजन समाज पार्टी किसी भी क्रांतिकारियों की विचारधारा का ना तो समर्थन करती है न ही उसका प्रचार. यह दल पूरी तरह से महात्मा फूले, डा. अम्बेड़कर आदि उन प्रतीकों की विचारधारा पर काम करती है जिन्होंने सीधे रुप से ब्राह्मणवादी विचारधारा का विरोध किया था.

इन दलों के अतिरिक्त जितने भी क्षेत्रीय दल है उनमें भयंकर विचार शून्यता है. जब तक डा. लोहिया जीवित रहे, समाजवादी पार्टियाँ सबसे ज्यादा वैचारिक रुप से मजबूत थी. उनके निधन के बाद ये सब जातिगत जोड़-तोड़ और परिस्थिति अन्य तक सीमित रह गयी है. अब स्थिति इतनी विकट है कि उत्तर प्रदेश में चल रही समाजवादी पार्टी जो पिछले 30 वर्षो से (जब 1989 में मुलायम सिंह उ0-प्र0 के मुख्यमंत्री बने पहले जनता दल 1992 से समाजवादी पार्टी) बड़ी शक्ति है. डा. लोहिया पर भी आज तक कोई कार्यक्रम राष्ट्रीय स्तर पर तो छोड़िये प्रदेश स्तर पर भी नहीं कर पायी है. आजादी की लड़ाई में 3 साल जेल में रहने वाले तथा आजादी के बाद भी 14 साल बाद जनता की लड़ाई लड़ने के लिए जेल में रहने वाले राजनारायण के संघर्ष को अभी भी उत्तर प्रदेश के शायद 5 फीसदी लोग भी नहीं जानते है. बाकी के संघर्ष को तो ये जनता तक क्या पहुंचाएंगे? इसके अतिरिक्त और भी पार्टियों व संगठन है, जैसे शिवसेना शिवाजी व कुछ हिन्दू प्रतीकों तक ही सीमित है.

जेडीयू व आरजेडी जे.पी. लोहिया का सिर्फ प्रतीक के रुप में नाम उपयोग करती है. लोकदल एक चौधरी चरण सिंह एक चौधरी देवीलाल तक ही सीमित है. बाकी राजनीतिक दल भी किसी एक या दो प्रतीकों तक ही सीमित है. आजादी की असली कीमत जनता तक कौन पहुँचायें?

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